बेटी की परिभाषा के लिए शब्दकोश में शब्द ही मौजूद नहीं

बेटी के बिना समाजिक ढ़ाचे की संरचना की कल्पना असंभव  

फतह सिंह उजाला
पटौदी ।
 सामाजिक रिश्तो की सबसे महत्वपूर्ण और अटूट कड़ी बेटी ही है । बेटी के बिना सामाजिक रिश्तो की कल्पना किया जाना असंभव है । वास्तव में बेटी सामाजिक विषयों की अटूट और महत्वपूर्ण कड़ी है । सीधे और सरल शब्दों में कहा जाए तो बेटी तमाम सामाजिक रिश्तो की फुलवारी ही है । यह बात आश्रम हरी मंदिर शिक्षण संस्थान के अधिष्ठाता महामंडलेश्वर धर्मदेव महाराज ने अपने संकल्प के मुताबिक 101 दत्तक पुत्रियों के आरंभिक 3 दिनों के दौरान संपन्न कराए गए विवाह और निकाह के उपरांत यहां से अन्य प्रांतों में रवाना होने से पहले कहीं।

पटौदी आश्रम हरी मंदिर संस्कृत महाविद्यालय परिसर में महामंडलेश्वर धर्मदेव के संकल्प के मुताबिक 101 दत्तक पुत्री ओं में से 11 दत्तक पुत्रीयों का विवाह और निकाह संपूर्ण विधि विधान और रीति-रिवाजों के मुताबिक किया गया । कोरोना कोविड-19 महामारी के चलते यह संभव नहीं हो पाया कि मेजबान संस्था के शताब्दी वर्ष के मौके पर महामंडलेश्वर ब्रह्मदेव के द्वारा किए गए संकल्प के मुताबिक सभी 101 पुत्रियों का विवाह यहां आयोजित हो सकता । क्योंकि हालात ऐसे बने लॉकडाउन की वजह से देशभर के विभिन्न प्रांतों के गरीब और जरूरतमंद परिवारों का अपनी पुत्रियों और वधू पक्ष का यहां पहुंचना सभव नहीं था । ऐसे में मानव जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए यही फैसला किया गया की शगुन के तौर पर 11 शादियां और निकाह मेजबान संस्था परिसर में ही संपन्न कराया जाए । इसके अलावा शेष शादियां मेजबान संस्था की जहां-जहां सहयोगी संस्थाएं हैं , वहीं पर विवाह- निकाह को 1 जुलाई देव सोने से पहले हिंदू संस्कृति , सनातन सभ्यता के मुताबिक संपूर्ण करा दिया जाए । 30 जुलाई 30 जून को महामंलेश्वर धर्मदेव महाराज का अपनी 101 दत्तक पुत्र क्यों के विवाह निकाह का संकल्प भी पूरा हो गया ।
महामंडलेश्वर धर्मदेव जी के मुताबिक बेटी किसी भी परिवार को कुदरत का दिया हुआ अनमोल ताहेफा ही होती है । बेटी के बिना घर का आंगन सुना सुना लगता है,  उन्होंने कहा बेटी की परिभाषा के लिए शब्दकोश में शब्द ही नहीं है । वास्तव में बेटी के बिना तमाम सामाजिक रिश्ते की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । बेटी की परिभाषा की जाए तो यह बेटी, मां ,बहन, दादी, बुआ ,अर्धांगिनी, चाची, ताई, मौसी ऐसे हर रिश्ते को संपूर्ण करती है, जोकि बेटी के बिना संभव ही नहीं है । वास्तव में बेटी समाज के लिए एक प्रकार से माला का वह मजबूत भाग अथवां सूत्र है , जिसके बिना समाज रूपी माला पूरी भी नहीं हो सकती है । उन्होंने भारी मन से कहा बेटी का मन बहुत ही कोमल और संवेदनशील होता है , बेटी घर में हो या विवाह के बाद अपनी ससुराल में । उसे हल्की सी भी भनक लग जाए या अहसास हो जाए कि उस के जन्मदाता मां-पिता किसी संकट में है, कोई परेशानी है या अन्य कोई समस्या है तो वह दौड़ी चली आती है । उन्होंने अपनी राय जाहिर करते कहा कि एक बार अपना बेटा तो मुसीबत के समय में मां बाप से मुंह मोड़ सकता है लेकिन बेटी किसी भी हाल में हो वह अपने मां बाप की कुशलक्षेम जानने के लिए अवश्य पहुंचती है ।

स्वामी धर्मदेव ने कहा की बेटी के निस्वार्थ सेवा भाव स्नेह, समर्पण, भाई के प्रति प्रेम जग जाहिर है । महाराज धर्मदेव ने कहा वास्तव में बेटी के बिना प्रकृति और मानव जीवन कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ।  यही बेटी जिसकी कोई परिभाषा नहीं, जिसके मन में कोई स्वार्थ नहीं, जब अपने अभिभावक के आंगन से विदा होती है तो वाह चाह कर भी अपने मन की व्यथा को बयान नहीं कर सकती । इसके साथ ही बेटी का एक और सर्व श्रेष्ठ गुण सहित स्वभाव है कि वह अपने जन्म देने वाले अभिभावक का आंगन-आवास छोड़कर जिस भी घर अथवा आंगन में जाती है उसे बहुत जल्द अपने घर आंगन जैसा ही बना लेती है । शताब्दी के निमित्त अभावग्रस्त परिवारों की 101 बेटियों के विवाह का जो संकल्प लिया था उसके अन्तर्गत पूज्यचरण गुरुवर के सान्निध्य में आश्रम हरि मन्दिर,पाटौदी की शाखा-अमर विद्या मन्दिर,भूरारानी (रुद्रपुर) उत्तराखण्ड में 13 जोड़ों का वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। पूजनीय श्री स्वामी रामानन्द जी महाराज की गरिमामयी उपस्थिति में गाँव-अर्चना,जिला-होशंगाबाद (मध्यप्रदेश) में भी 7 कन्याओं का वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ गया।

उन्होंने बेबाक शब्दों में कहा की वास्तव में 101 दत्तक पुत्रिओ का विवाह तो समाज के प्रत्येक व्यक्ति के सामर्थ के सहयोग के मुताबिक संपन्न हो रहा है । यहां संस्था में होने वाले विवाह के अलावा 12 शादियाँ भूरारानी (उत्तराखण्ड) तथा 12 शादियाँ बिलासपुर (उत्तरप्रदेश) में 28, 29, 30 जून को की जायेंगी, 3 शादियाँ परमहंस आश्रम, वृन्दावन, 1 शादी गोन्दर जिला-करनाल में तथा 2 शादियाँ परमगुरुदेव ब्रह्मलीन स्वामी अमरदेव महाराज की जन्मभूमि गाँव-कन्सुहाँकलाँ (पटियाला) गुरुद्वारे में की जायेंगी। 8 शादियाँ पूज्यचरण  स्वामी रामानन्द महाराज (आदिबद्री वालों) की देखरेख में गाँव-अर्चना जिला- होशंगाबाद (मध्यप्रदेश) में की जायेंगी। इनके अतिरिक्त शेष बची 52 शादियाँ सम्बन्धित परिवार अपने-अपने घरों में सम्पन्न करेंगे। लेकिन इसका सारा श्रेय स्वामी धर्मदेव को दिया जा रहा है , उन्होंने कहा मैं तो केवल मात्र एक माध्यम हूं । इस भव्य और पुण्य कार्य को करने वाली जनता जनार्दन ही है।
जो 101 दत्तक पुत्रियां महामंडलेश्वर रामदेव जी के द्वारा चुनी गई , उनमें 12 मुस्लिम दत्तक पुत्रीयां, 12 ईसाई दत्तक पुत्रियां, 3 सिख दत्तक पुत्रियां और 74 हिंदू दत्तक पुत्रियां शामिल है । इन सभी की शादी और विवाह अथवा वैवाहिक जीवन के लिए इनका पाण्ीी ग्रहण संस्कार संबंधित परिवारों के माने जाने वाले धर्म संस्कृति के मुताबिक ही पूरा किया। 12 दत्तक पुत्रीयों की शादी भूरारानी उत्तराखंड, 12 दत्तक पुित्रयो की शादी बिलासपुर उत्तर प्रदेश, 3 दत्तक पुत्रियों की शादी परमहंस आश्रम वृंदावन, एक दत्तक पुत्री की शादी गोंडा जिला करनाल और दो दत्तक पुत्रियों की शादी ब्रह्मलीन स्वामी अमर देव महाराज जोकि महामंडलेश्वर धर्मदेव जी के दादा गुरु है उनके गांव कनसुहा कला पटियाला गुरुद्वारे में संपन्न की गई। आठ दत्तक पुत्रियों की शादी स्वामी रामानंद महाराज गांव अर्चना में होशंगाबाद मध्य प्रदेश में संपन्न हुई। इनके अलावा जो भी दत्तक पुत्रियां रही , उनके परिजनों से आग्रह किया गया है कोरोना कॉविड नहीं जैसी महामारी को ध्यान में रखते हुए बहुत ही सीमित अतिथियों को आमंत्रित कर पूरे विधि विधान के साथ में विवाह करके इनकी विदा कर दिया गया।
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