कश्मीर में अलगाववाद को बड़ा झटका

मनीषबलवान सिंह जांगड़ा, हिसार
वरिष्ठ हुर्रियतनेता सैयद अली शाह गिलानी ने ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से इस्तीफ़ा देने का ऐलान किया है। गिलानी जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन के सबसे बड़े नेता हैं। धारा-370 के हटाने के बाद अलवगाववादी खेमे की ये सबसे बड़ी घटना है।

ऑडियो क्लिप से दिया इस्तीफा।

सैयद अली शाह गिलानी ने एक ऑडियो क्लिप जारी कर इस्तीफ़ा दिया है जिसमे उन्होंने कहा, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के मौजूदा हालात को देखते हुए मैं हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से इस्तीफ़ा देता हूं। बाकी सभी सदस्यों को चिट्टी लिखकर जानकारी दे दी गई है।

गिलानी हमेशा से विवादों में रहे हैं।

सैयद अली शाह गिलानी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सबसे वरिष्ठ नेता हैं जिनपर पाकिस्तानपरस्ती का आरोप लगता रहा है। गिलानी ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष है जिनको कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियों का सरगना भी कहा जाता है। 2010 में उनपर देशद्रोह का मुकद्दमा लग चुका है, वो पाकिस्तान से अवैध फंडिंग के सिलसिले में एनआईए की जांच के दायरे में है। उन्हें साल 2010 से घर में नज़रबंद किया गया है लेकिन कुछ महीनों से उनकी तबियत खराब होने की खबरें भी चल रही थी। 

 कश्मीर में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का उदय।

साल 1989 के चुनावों में नेशनल कॉन्फ्रेंस व कांग्रेस पर धांधली का आरोप लगा जिसकी आग पूरे कश्मीर में फैली। कश्मीर के नौजवान सड़कों पर आये और आंतकवादी गतिविधियों में शामिल होने लगे। उन्हें हथियार और ट्रेनिंग पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने दी। 1989 में सैयद अली शाह गिलानी ने विधायक पद से इस्तीफ़ा दे दिया और कश्मीर में अलगाववाद का नेतृत्व किया। साल 1993 में 26 अलगाववादी संगठनों ने मिलकर ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का गठन क़िया जिसने कश्मीर के युवाओं को चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के लिए एक मंच मुहैया करवाया। साल 2002 आते आते हुर्रियत कॉन्फ्रेंस दो हिस्सों में बंट गयीं, एक तरफ मॉडरेट या नरमपंथी समूह कहा गया जिसका नेतृत्व मीर वाइज़ उमर फ़ारूक़ को मिला, दूसरा कट्टरपंथी समूह का नैतृत्व सैयद अली शाह गिलानी को मिला।
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